औषधियां और उत्पाद बनाने के पहले ध्यान देने योग्य बातें

1) औषधियां तथा उत्पाद बनाने का स्थान स्वच्छ एवं पवित्र हो
  1. औषधि निर्माण में स्वच्छता का बहुत महत्व है । इसलिए औषधि बनाने के पक्ष तथा उपकरणों को स्वच्छ रखें ।
  2. औषधि बनाना आरंभ करने से पहले हाथ-पैर अच्छे से धो लें ।
  3. ओषधि कक्ष को देवघर के समान पवित्र रखें । औषधि बनाते समय देवता का नाम जप करें । इसके प्रभाव से औषधियों का गुण बढ़ जाता है ।
  4. औषधियों में कचरा न गिरे इसका ध्यान रखे हैं ।
  5. औषधियों में बाल न आएं इसके लिए औषधि निर्माण कक्ष में प्रवेश करने से पहले सिर के बालों को पूर्णतः ढकने वाली टोपी पहने या सिर पर कपड़ा बांध दें ।
  6. अन्य उत्पाद बनाते समय भी उपरोक्त सूचनाओं का पालन करें ।
2) औषधियां तथा उत्पाद बनाने हेतु आवश्यक सामग्री
  1. इंधन : गौशाला में बायोगैस की सुविधा हो तब इसी पर उत्पाद बनाएं क्योंकि यह अच्छा और सस्ता होता है । बायोगैस की आंच सहजता से घटाई बढ़ाई जा सकती है । इसलिए ताप नियंत्रित करना सरल होता है । चूल्हे पर औषधियां बनाते समय आंच घटने बढ़ने की संभावना अधिक रहती है । आंच बढ़ने पर औषधियां जल जाती है ।
  2. बर्तन
  • औषधियां बनाने के लिए एल्यूमीनियम के बर्तनों का उपयोग न करें । इन बर्तनों में बनाई औषधियों विषमिश्रित होती हैं ।
  • गोमूत्र आदि गर्म करने हेतु तथा मिलाने के लिए लोहे अथवा स्टेनलेस स्टील के बर्तनों का प्रयोग करें । कुछ विशिष्ट औषधियां बनाने के लिए उन औषधियों को बनाने की विधि में बताए अनुसार तांबे के बर्तनों का उपयोग करें ।
  • गोमूत्र का कोई भी प्रकार उधारण नया गोमूत्र, अर्क, घनवटी (गौमूत्र उबाल कर बनाई गोलियां) का धातु के पात्र में भंडारण न करें ।
  • तैयार औषधियां कांच के बर्तनों में रखना सर्वश्रेष्ठ है, परंतु कांच के स्थान पर अच्छी गुणवत्ता के प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग किया जा सकता है ।
  1. अर्क यंत्र
  • अर्क यंत्र के प्रमुख घटक : गोमूत्र से अर्क बनाने के लिए अर्क यंत्र का उपयोग किया जाता है । प्राचीन काल से ही विविधि प्रकार के अर्क तथा मध बनाने के लिए अर्क यंत्र का प्रयोग होता रहा है । यद्यपि अर्क यंत्र के विविध प्रकार है, तथापि उसके प्रमुख अंग समान होते हैं । ये अंग नीचे दिए चित्र में दिखाएं गए हैं । इनमें जिस बंद पात्र में द्रव पदार्थ उबाला जाता है, उसे बाष्पक कहते हैं । बाष्पक में बनी भाप आगे ‘शीतक’ (कंडेन्सर भाप को ठंडा करने वाली प्रणाली)मैं जाती है। यहां भाप की नली के चारों और एक पेटी होती है । इस पेटी में नीचे की ओर से साधारण पानी आता रहता है । नली के भाप की उष्मा को खींचकर यह पानी गर्म हो जाता है और पेटी के ऊपरी भाग की नली से बाहर निकल जाता है । इस प्रक्रिया में नली की भाप का रूपांतर द्रव में होता है, जिसे नीचे रखे संग्राहक पात्र में (अर्क एकत्र करने के बर्तन में) जमा कर लिया जाता है ।
  • गोमूत्र का अर्क बनाने के लिए अर्क यंत्र किस धातु का बना होना चाहिए? : गोमूत्र अर्क बनाने के लिए अर्क यंत्र मिट्टी, कांच अथवा स्टेनलेस स्टील का बना होना चाहिए । तांबे अथवा अन्य धातुओं से बने अर्क यंत्र का प्रयोग न करें, क्योंकि इन धातुओं से गोमूत्र की रासायनिक प्रक्रिया होती है ।
  • अर्क यंत्र बनाने की सरल पद्धति : शल्यचिकित्सा के समय उपकरणों को कीटाणु रहित बनाने के लिए स्टेनलेस स्टील से बने ‘ऑटोक्लेव’ नामक ‘प्रेशर कुकर’ का उपयोग किया जाता है । गोमूत्र अर्क बनाने के लिए भी इसका उपयोग की भांति किया जा सकता है । उत्तम श्रेणी के स्टील के प्रेशर कुकर का भी बाष्पक के रुप में उपयोग किया जा सकता है । ‘बोरोसिल’ नामक एक प्रकार के कठोर कांच से बना शीतक (कंडेंसर) दुकान में मिलता है । मिट्टी, लकड़ी अथवा बांस से भी शीतक बनाया जा सकता है । बाष्पक और शीतक को जोड़ने के लिए उत्तम श्रेणी की और उष्णता सहने योग्य प्लास्टिक की नली का प्रयोग किया जा सकता है । अर्क जमा करने के लिए शीतक की नली के नीचे रखा जाने वाला बर्तन मिट्टी का, चीनी मिट्टी का अर्थ उत्तम श्रेणी के प्लास्टिक का होना चाहिए । इसके लिए धातु के बर्तनों का उपयोग न करें ।
3) पंचगव्य
  1. पंचगव्यों से संबंधी सामान्य नियम : दूध, दही अथवा छाछ, नवनीत (मक्खन) अथवा घी, गोमूत्र एवं गोमय (गोबर) से सर्व गव्य भारतीय गाय के ही लें ।
  2. घी संबंधी नियम : औषधियों में प्रयोग किया जाने वाला घी पारंपरिक पद्धती से, अर्थात दूध से दही जमाना, दही मथकर मक्खन बनाना तथा इस मक्खन को पिघलाकर घी बनाना, इन चरणों में बनाया गया हो ।
  3. औषधियों के लिए गोमूत्र और गोबर एकत्रित करने के 10 नियम

    • गाय की देह से संबंधित 4 नियम

    1) स्वास्थ्य : गोवंश निरोगी होना चाहिए। रोगी गाय-बैलों के गव्य न लें । गाय-बैल के कान ठंडे हों तथा उनके होंठ सूखे हुए हों, तो समझ लें कि वे अस्वस्थ हैं ।

    2) आयु : गोवंश जननक्षम बनने पर अर्थात साधारणतः उनके जन्म के ढ़ाई वर्ष उपरांत ही उनके मूत्र का उपयोग औषधि के लिए करना चाहिए, उसके पूर्व उसका उपयोग न करें ।

    3) आहार : गोवंश दिनभर एक ही स्थान पर बंधा हुआ न रहे । दिन में न्यूनतम 5 घंटे जंगल में चरने वाला हो । चरने वाले गोवंश के मूत्र में ही असाध्य रोगों में लाभकारी औषधीय गुण धर्म होते हैं ।

    4) प्रजनन : बैल का गाय से संगम होने पर 2- 3 दिन गाय का मूत्र औषधि के लिए नहीं लेना चाहिए । गाय प्रसूत तो होने से 45 दिन पूर्व तथा प्रसूत होने के 45 दिन पश्चात उसका मूत्र नहीं लेना चाहिए, क्योंकि इन दिनों में उसके मूत्र में गर्भजनित अशुद्धि रहती है ।

    • काल से संबंधित 3 नियम

    1) तिथि : एकादशी और अमावस्या इन तिथियों पर गोमूत्र और गोमय एकत्रित नहीं करनी चाहिए । एकादशी के दिन चंद्र की किरणें पृथ्वी पर एक विशिष्ट कोण से आती हैं तथा अमावस्या के दिन आकाश में चंद्र दिखाई नहीं देता । इसलिए गोमूत्र पर चंद्र किरणों का संस्कार नहीं होता । पूर्णिमा की रात बना गोमूत्र सर्वधिक फलदायी होता है, क्योंकि उस पर चंद्र किरणों का सुयोग्य संस्कार होता है ।

    2) ऋतु : सूर्य जब पृथ्वी से अत्यधिक दूर होता है अर्थात अत्यधिक शीत रितु में गोमूत्र और गोबर एकत्रित नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसे गोमूत्र में सूर्य की अपेक्षित उर्जा पर्याप्त मात्रा में नहीं होती । वर्षा ऋतु में वातावरण में मेघ छाए हुए होते हैं तथा दिनभर चंद्र-सूर्य दिखाई नहीं देते उस समय गव्य एकत्रित नहीं करने चाहिए ।

    3) ग्रहण : चंद्रग्रहण अथवा सूर्य ग्रहण के दिन भी एकत्रित नहीं करने चाहिए ।

    • गव्यों से संबंधित 2 नियम

    1) भूमि से संयोग : भूमि पर पड़े गव्य औषधि के लिए नहीं लेने चाहिए । उन्हें ऊपर ही झेलना चाहिए ।

    2) संग्रह पत्र : गव्य धातु के पात्रों में एकत्रित नहीं करनी चाहिए । गव्य एकत्रित करने के लिए मिट्टी,कांच अथवा उच्च स्तरीय प्लास्टिक के पात्र का उपयोग करना चाहिए । गोमय के लिए वृक्ष के बड़े पत्ते का अथवा बांस से बनी छोटी टोकरी का उपयोग करना चाहिए ।

    औषधियों के लिए गव्यों का उपयोग करना हो, तो गव्य एकत्रित करते समय उक्त नियमों का पालन आवश्यक है । कृषि अथवा गृह उपयोगी उत्पाद अर्थात मच्छर प्रतिबंधक धूपबत्ती और बर्तन स्वच्छ करने वाला चूर्ण बनाने हेतु इन नियमों का पालन करने की आवश्यकता नहीं है ।

    • गोपालक की श्रद्धा से संबंधित एक नियम

    1) गव्य एकत्रित करते समय गौ माता साक्षात देवता है, ऐसा गोपालक का भाव होना चाहिए । गव्य एकत्रित करने से पूर्व गौ माता से भावपूर्ण प्रार्थना करें ।

  4. गोमूत्र कब और कैसे एकत्रित करें? : गोमूत्र एकत्र करने के 10 नियमों का पालन करें और गाय जब मूत्र करे तब उसे एकत्र करें ।
    • गोमूत्र लेने के लिए जाते समय-मन-ही मन गाय के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर आगे दी हुई प्रार्थना करें ।‘ हे गौमाता, आपका मूत्र साक्षात अमृत ही है । आपकी कृपा से मैं औषधि बना सकता हूं । ‘आपसे मिलने वाले इस अमृत से रोगी के रोग दूर हों’, यह आपसे प्रार्थना है ।‘
    • सामान्यतः दूध देने के पहले गाय एक बार गोमूत्र देती है । प्रातः और सायं गाय का दूध निकालते समय गोमुत्र इकट्ठा करें ।
    • सायंकाल गाय का दूध निकालने के पश्चात रात में 3-3 घंटे पर गाय को उठाकर मूत्र त्यागने का अभ्यास कराया जा सकता है । सायंकाल 6:00 बजे दूध दूहने के पश्चात रात में 9,12 और 3 बजे गोमूत्र इकट्ठा करें ।
    • गाय बैठी हो, तब उसे प्रेम से थपथपा कर उठाएं । उसके उठने पर उसकी पीठ को धीरे-धीरे थपथपाएं अथवा मूत्र मार्ग को धीरे से उंगली लगाएं । इससे गाय को मूत्र करने की उत्तेजना मिलती है और वह मूत्र करने लगती है । इस प्रकार अभ्यास कराने पर गाय निर्धारित समय पर मूत्र करने लगती है ।
    • गाय का अभ्यास होने तक आरंभ में कुछ दिन गोमूत्र अल्प मिलता है । एक बार अभ्यास हो जाने पर ‘गोपालक मूत्र लेने के लिए आया है’, यह समझने पर वह अपने आप खड़े होकर मूत्र करने लगती है । कभी-कभी हमें गाय के पास पहुंचने में विलंब हो जाता है, तब वह हमारे पहुंचने तक मूत्र रोके रहती है । गाय से हम जितना प्रेम करते हैं उस से दस गुना वह हम से प्रेम करते हैं ।
  5. एकत्र किए गोमूत्र का उपयोग और भंडारण
  • पीने के लिए ताजे गोमूत्र का उपयोग करें ।
  • रात में एकत्र किए गए गोमूत्र को प्रातः सूर्योदय के पहले अर्क यंत्र में डालकर गोमूत्र चंद्रमा अर्क बनाना आरंभ करें ।
  • शेष बचे गोमुत्र को अच्छी श्रेणी के प्लास्टिक के पीपों में भरकर रखें । इस गोमूत्र का उपयोग अन्य औषधियां बनाने हेतु कर सकते हैं ।
  • गोठे की नाली से बहने वाले गोमूत्र का उपयोग क्रषि के लिए करें ।
4) औषधियों के अन्य घटक पदार्थ, उनकी गुणवत्ता तथा भंडारण
  • काष्ठौषधि

1) औषधियां बनाने हेतु आवश्यक काष्ठौषधि यथासंभव ताजी ही ले । संभव हो तो अपने लिए आवश्यक वनौषधियों को स्वयं रोपें ।

2) ताजी वनौषधि न मिल पाए तब काष्ठौषधि की दुकान से वनस्पति का मोटा चूर्ण (छोटे-बड़े टुकड़े) आवश्यक मात्रा में ही क्रय करें ।

3) चूर्ण में मिलावटकी संभावना अधिक रहती है । इसलिए यथासंभव चूर्ण क्रय न करें ।

4) वनौषधि शुद्ध नई और अच्छी देख कर ही लाएं । पुरानी वनौषधि का प्रयोग न करें ।

5) दुकान से लाई वनौषधि वैसे ही न कूटें । कूटने से पहले उसमें से धूल, कचरा पड़ा हो, तो निकाल दें । औषधि के सड़े-गले कीड़े लगे टुकडे निकाल कर औषधि चुनने के उपरांत ही कुटें ।

  • गुड :औषधियां बनाने के लिए उपयोग में लाया जाने वाला गुड़ जैविक और पुराना होना चाहिए परंतु वह दुर्गंधयुक्त, खट्टा अथवा खारा नहीं होना चाहिए ।
  • मधु शुद्ध मधु की विशेषताएं

1) पानी में तुरंत नहीं घुलना :एक चम्मच में मधु लेकर यह चम्मच पानी से भरी कटोरी में रखें । कटोरी धीरे-धीरे हिलाने पर मधु का गोला बनने लगे तो समझ लें कि मधु सुद्ध है । गुड मिश्रित पानी अथवा महिया हो, तो वह पानी में घुलने लगता है । अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि यह परीक्षा अधिक वर्षा वाले प्रदेश के मधु पर लागू नहीं होती ।

2) नए कपड़े सीने चिपकना :एक नया कोरा सूती कपड़ा लें, जिसकी मांडने न निकली हो । यह कपड़ा टेढा पकड़कर उस पर मधु की धारा डालें । यदि मधु कपड़े से चिपके बिना नीचे फिसल जाए तो उसे शुद्ध समझें । मधु की बूंदे कपड़े से चिपक जाएं तो समझ लें कि उसमें मिलावट है ।

3) मधुमें डुबाई बाती का बिना तडतडाए जलना : मधु में कपास की बाती डुबाकर निकालें । अब मधु नीचोड़कर बाती जलाएं । यदि वह आराम से बिना तडतडाए जलती है तो समझ लें मधु शुद्ध है ।

  • अमृतधारा :यह ‘पंचगव्य दंत मंजन’ तथा वेदना नाशक तेल इन औषधियों का एक घटक पदार्थ है । केवल इसी औषधि में किसी गव्य का उपयोग नहीं किया जाता । यह ऐसी द्रव औषधि है, जो अनेक रोगों में अमृत समान उपयोगी है । इसीलिए इसका नाम ‘अमृतधारा’ है ।यह आयुर्वेदिय औषधियों की दुकान में मिलती है; परंतु स्वयं बनाने पर सस्ती और अच्छी गुणवत्ता की मिलती है ।

1) आवश्यक सामग्री : 500 मिलीलीटर आइटम की कांच की बनी

2) घटक पदार्थ तथा उनकी मात्रा

  • अजवाइन: 700 ग्राम
  • पुदीना सतः 100 ग्राम
  • भीमसेन कपूरः 100 ग्राम

उपर्युक्त तीनों पदार्थ आयुर्वेदिक औषधियों की दुकान में मिलते हैं ।

3) बनाने की विधिः कांच की बरनी में उपर्युक्त तीनों पदार्थ घर रूप में रखें । ऐसा करने से एक द्रव पदार्थ बनता है । इसी द्रव पदार्थ को अमृतधारा कहते हैं ।

 

5) प्रत्यक्ष औषधनिर्मित
  1. गोमय रस निकालनाः गोमय रस में गाय के गोबर के औषधीय तत्व रहते हैं । इसके दो प्रकार हैं- ‘शुद्ध गोमय रस’ तथा ‘गोमूत्र मिश्रित गोमया रस’ ।
    1. शुद्ध गोमय रसः गोमय में गोमूत्र डाले बिना निकाला गया शुद्ध गोमय रस अल्प मात्रा में मिलता है । यह गोमय रस औषधियां बनाने के लिए श्रेष्ठ है ।
      1. शुद्ध गोमय रस प्राप्त करने की विधि
        1. गोमय को कपड़े में बांधकर दबाकर रस निकालनाः जिस प्रकार श्रीखंड का चक्का बनाते समय दही को कपडे में बांधते हैं, उसी प्रकार, एक स्वेत स्वच्छ सूती कपड़े में नया गोमय बांधकर धीरे-धीरे दबाएं । इससे पोटली से गोमय रस टपकने लगता है । इसे बर्तन में जमा कर लें ।
        2. गोमय में कपड़ा रखकर उसे निचोड़ कर रस निकालनाः एक स्वच्छ सूती कपड़ा पानी में भिगोकर कसकर निचोड़ लें । अब एक प्लास्टिक के बर्तन में नया गोमय लें और उसमें यह कपड़ा डुबा दें । ऐसा करने से गोमय का रस कपड़ा सोख लेगा । 15 – 20 मिनट पश्चात यह कपड़ा निकालें और इसे एक बर्तन में अच्छे से निचोड़कर गोमय रस प्राप्त कर लें ।
      2. गोमूत्र मिश्रित गोमय रस तथा उसे निकालने की पद्धतिः 1 किलोग्राम नए गोमय में 1 लीटर गोमूत्र अच्छे से मिलाएं तथा इस गोल को श्वेत स्वच्छ सूती कपड़े में बांधे और दबाकर रस निकाल लें । गोमुत्रमिश्रित गोमय रस, शुद्घ गोमय रस की तुलना में कनिष्ठ होता है । रस निकालने के लिए गोमूत्र के स्थान पर पानी न मिलाएं । क्योंकि इससे गोमय रस का अपेक्षित लाभ नहीं मिलता ।
  2. दूध, छाछ आदि एकत्र मिलानाः किसी औषधि में दूध और छाछ दोनों मिलाने के लिए कहा गया हो, तब एक (दूध अथवा छाछ) मिलाकर तुरंत दूसरे न मिलाएं दोनों के मध्य घी, गोमूत्र अथवा गोमय इनमें से जो बताया हो, वह मिलाएं । किसी-किसी औषधि में पांचों गव्य मिलाने हों, तो दूध और छाछ में से कोई एक पहले और दूसरा अंत में मिलाएं ।
  3. काष्ठौषधियां का चूर्ण बनाना, उन्हें आपस में मिलाना तथा चूर्ण गोमूत्र क्षार में भिगाना
    1. एक बार में अधिक चूर्ण न बनाएं, आवश्यक मात्रा में ही बनाए ।
    2. यंत्र में औषधि पीसते समय उत्पन ऊष्मा से औषधियों के कार्यकारी तत्व कुछ घट जाते हैं । ऐसा न हो, इसके लिए वनस्पतियों को खलबत्ते में कूटने के पश्चात चक्की में पीसकर चूर्ण बनाना आदर्श पद्धति है; परंतु आजकल सबके लिए यह संभव नहीं, इसलिए मिक्सर अथवा चक्की की का प्रयोग किया जाता है ।
    3. पीसकर चूर्ण बनाने के पश्चात बारिक चलनी अथवा नायलोन के कपड़े से छान लें । कपड़े से छाना हुआ चूर्ण बहुत बारीक होता है । इसे कपड़ा छान चूर्ण कहते हैं ।
    4. एक से अधिक चूर्ण मिलाने के लिए उन्हें बड़े डिब्बे में लेकर एकरूप होने तक मिलाते रहें ।
    5. गोमुत्र क्षार में औषधियां भिगाना हो, तो क्षार की मात्रा इतनी होनी चाहिए कि उसमें चूर्ण पूरे भीग जाएं ।

 

6) बनाई गई औषधियां तथा उत्पादों को बांधकर तैयार करना
  1. कोई भी औषधि बोतल अथवा डिब्बे में भरते समय बोतल अथवा डिब्बा पूर्णतः सूखा होना आवश्यक है
  2. गोमूत्र आसव, बाल पाल रस और नारी संजीवनी यह औषधियां पूर्णतः बनाने के पश्चात ही बोतल में भरे अन्यथा उससे वायु उत्पन्न होकर बोतल फूट सकती है अथवा उसका ढक्कन उड़ सकता है । औषधि यदि परिपक्व न हुआ हो, तो बोतल में अधिक झाग दिखाई देता है । परिपक्व औषधि बोतल में भर कर हिलाने पर अल्प मात्रा में झाग उत्पन्न होते है परंतु वह तुरंत समाप्त हो जाता है ।

 

7) औषधियों का कृति पाठ (औषधियां बनाने संबंधित क्रमवार विवेचन) तथा औषधियां बनाने की अनुज्ञप्ति (लाइसेंस)
  1. ग्रंथ में वर्णित औषधियों के कृति पाठ लेखक तथा अन्य वैधों के अनुभव से बने हैं । इनका इसी प्रकार प्राचीन ग्रंथों में मिलना आवश्यक नहीं ।
  2. औषधियों के प्रति पाठ बनाते समय औषधिय पदार्थ व्यर्थ न हों तथा उनका पूरा-पूरा उपयोग हो, इसका ध्यान रखा है, उदाहरण गोमूत्र अर्क में मिलाई औषधियों की बची हुई सिठीका (रसहीन भाग का) उपयोग पित्त शामक चूर्ण के लिए करना ।
  3. कोई भी व्यक्ति अपने उपयोग के लिए औषधियां बना सकता है । कोई वैध अपने रोगियों के लिए स्वयं औषधियां बना सकता है । इस समय सासकीय अनुज्ञप्ति की आवश्यकता नहीं रहती । मात्र व्यवसायिक स्तर पर औषधियां बनाने तथा वितरित करने हेतु शासन की अनुज्ञप्ति आवश्यक है ।